आज की युवा पीढ़ी

आज समय बदल रहा है, तो नई पीढ़ी की सोच तथा जीवन जीने की शैली में भी परिवर्तन हो रहा है. इसका सीधा प्रभाव परिवारों पर पड़ रहा है. आज के युवा जीवन में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते हैं, फिर चाहे वे अपने माता-पिता ही क्यों न हो! आज के युवा को अपने करियर को लेकर बहुत ज्यादा असुरक्षा का सामना करना पड़ता है, तो बदलती परिस्थितियों में कोई विदेशों में बसना चाहता है तो कोई अपने ही देश में, महानगरों में भविष्य तलाशता है. इस चक्कर में वो एक जगह टिक नहीं पाते हैं और ऐसे में माता-पिता की जिम्मेदारी उन्हें बोझ लगने लगती है. शहरों में आबादी का केंद्रीकरण और गलाकाट प्रतियोगिता भी अपने बुजुर्गों से दुराव का एक बड़ा कारण है. ऐसे में, वे इस बोझ से छुटकारा पाना चाहते हैं और वृद्धाश्रम के रूप में उन्हें समस्या का ‘विकलांग समाधान’ मिल जाता है. बिचारे बुजुर्ग अपना सारा जीवन और जीवन की सारी कमाई अपने बच्चों पर लुटाने के बाद खाली हाथ और बेबस हो कर आश्रम जाने को मजबूर हो जाते हैं और फिर जीवन के बाकी दिन अपने परिवार से दूर रह कर तड़पते रहते हैं, सिसकते रहते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसे कृत्य समाज के संपन्न-वर्ग द्वारा ज्यादा देखने को मिल रहे हैं, तथाकथित आधुनिकता और बड़ी सोसायटी के नाम पर! इन्हीं लोगों द्वारा आजकल ये बात आम तौर पर सुनने को मिल जाती है कि हमारे समाज में पश्चिमी सभ्यता का असर हो गया है और वृद्धाश्रम भी उसी विकृति का एक हिस्सा है. लेकिन ऐसे लोग एक बात भूल जाते हैं कि पश्चिमी देशों की तुलना में हमारी संस्कृति और सभ्यता बिलकुल अलग है. पश्चिम में बच्चे बालिग होने के साथ ही स्वतंत्र हो जाते हैं और अपनी जिम्मेदारी खुद उठाते हैं. वो माँ बाप को घर से नहीं निकालते, बल्कि माँ-बाप का घर खुद ही छोड़ देते हैं. इसके उलट हमारे यहाँ हमारी सभी जरूरतों को चाहे वो  अपनी पढ़ाई को पूरी करने तथा कमाई शुरू करने  और उसके बाद तक का ध्यान अभिभावकों द्वारा रखा जाता है. यहाँ बच्चों को पालने – पोसने की एक परंपरा और संस्कृति है! इसके लिए माता-पिता अपने जीवन में कोई कसर नहीं छोड़ते और अपने भविष्य की चिंता किये बिना अपनी सारी कमाई अपने बच्चों पर खर्च कर देते हैं. और तो और उनकी अचल सम्पति पर भी बच्चे स्वतः ही अपना अधिकार समझने लगते हैं.

 

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