हिंदी भाषा में मात्राओं को पढ़ना-लिखना कैसे सिखाएं?

1  .  वर्णों की पहचान है जरूरी

मात्रा सिखाते समय ध्यान रखने वाली सबसे जरूरी बात है, “नई मात्रा ऐसे वर्णों के साथ सिखाएं जिसे बच्चे पहले से जानते हों। यह भी ध्यान रखें कि जो मात्रा हम सिखाना चाहते हैं उसके वर्ण प्रतीक और मात्रा प्रतीक को बच्चे पहचानते हों, साथ ही उनकी आवाज़ों को भी जानते हों।”मात्रा सीखना पूरी तरह से सही और नियमित अभ्यास का मामला है। ऐसे में जरूरी है कि नई मात्रा सिखाने के बाद दो-तीन दिन तक लगातार उसके अभ्यास और दोहरान का मौका बच्चों को मिले।

इस दौरान शिक्षक को हर बच्चे तक पहुंचने की कोशिश करनी चाहिए। ताकि उनको पता चल सके कि कोन से बच्चे मात्राओं को अच्छी तरह पकड़ रहे हैं और किन बच्चों को कहां पर दिक्कत हो रही है? इससे उन बच्चों को आगे सपोर्ट करना शिक्षक के लिए काफी आसान हो जाएगा।

2  .  एक दिन में एक ही मात्रा सिखाएं

एक उदाहरण के माध्यम से बात करते हैं। किसी स्कूल में  पहली कक्षा के बच्चों ने ‘ई’ की मात्रा सीखी। अगर इसी दिन ‘ऐ’ और’औ’ की मात्राओं के बारे में भी बच्चों को बताया जाये तो क्या होगा? इस बात की ज्यादा संभावना है कि बच्चों ने जो नई मात्रा सीखी है उसके अभ्यास का कम मौका मिलेगा। नई लर्निंग को समझ का हिस्सा बनने के लिए अभ्यास का जो अवसर बच्चों को मिलना चाहिए, वह शायद नहीं मिल पाएगा।

इसके बाद ऐसे शब्दों को पढ़ने का अवसर दिया जाये जो उन्हीं मात्राओं से बने हों जिसे बच्चों ने सीखा है। इससे बच्चे अंततः मात्राओं के लगने के बाद वर्णों की आवाज़ में होने वाले परिवर्तन को साफ़-साफ़ पहचान पाते हैं, बोलकर बता पाते हैं और अगर लिखने का भी मौका दिया जाये तो अच्छा श्रुतलेख भी लिख सकते हैं।

3  . आवाज़ में होने वाले बदलाव को स्पष्ट करें

किसी वर्ण के साथ मात्रा लगने पर उसकी आवाज़ में बदलाव होता है, अगर इस बात को समझने का मौका बच्चों को मिले तो वे बहुत आसानी से मात्राओं के कांसेप्ट को समझ सकते हैं। उदाहरण के लिए इसके लिए जिन वर्णों को बच्चे पहले से जान रहे थे, उसमें ‘ई’ की मात्रा लगाने के बाद बच्चों को पढ़कर बताया कि उसकी आवाज़ कैसे बदल रही है। (जैसे क+ी=की, र+ ी= री)।

 

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