नैतिक मूल्य हमारी संस्कृति

अशिष्टता क्यों पनप रही है, इस पर गंभीर मंथन की जरूरत है। अशिष्टता के लिए हम युवा पीढ़ी को भी पूरी तरह दोषी नहीं ठहरा सकते। इसके लिए परिवार, सामाजिक वातावरण व पड़ोस आदि भी जिम्मेदार हैं। जब बच्चा पैदा होता है तो उसकी परवरिश का जिम्मा परिवार पर होता है। उसे जैसे संस्कार दिए जाते हैं वह बड़ा होकर उसी के अनुरूप चलता है। इसके साथ ही समाज का भी इसमें अहम योगदान होता है। इसलिए बच्चों को शुरू से अच्छे संस्कार दिए जाने चाहिए। जहां पर बच्चा गलत करे उसे बताना चाहिए। इसके लिए बच्चों को नैतिक मूल्यों के साथ अपनी संस्कृति से भी रूबरू करवाना चाहिए। नैतिक मूल्य हमारी संस्कृति की पहचान होते हैं।आज किसी से यह पूछा जाए कि आपका लक्ष्य क्या है तो वह यही कहता है कि पैसा। उसको पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने की ललक उनमें है। चाहे वह गलत रास्ते अपनाकर ही क्यों न पूरी करनी पड़े। न जाने कितने ही ऐसे उदाहरण देखने को मिल जाएंगे जो यह दर्शाते हैं कि युवा वर्ग खुद में नैतिक मूल्यों को कितना गिरा चुके हैं। दुख तो इस बात पर होता है कि शिष्टाचार, संस्कार व नैतिकता की उन्हें पहचान ही नहीं और न ही वह इसको मानने को तैयार हैं। आज की युवा पीढ़ी तो पागल हाथी की तरह नैतिकता व संस्कारों को भुलाकर अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को रौंदते हुए चली जा रही है। वह इस बात से बेखबर हैं कि जब भी जमीन पर गिरेंगे तो क्या हाल होगा। यह सिर्फ नैतिक मूल्यों की कमी के कारण ही हो रहा है।

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